Aahen Aur Muskan-II
Aahen Aur Muskan-II
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कुछ लेखक ऐसे नाटक लिखते हैं जो पढ़ने में काफी अच्छे लगते हैं पर मंच पर सफल नहीं हो पाते। और कुछ तो ऐसे नाटक लिखते हैं जैसे उन्हें मंच की सीमा का ध्यान ही न रहा हो। सवाल यह है कि नाटक का सम्बन्ध पाठकों से है या दर्शकों से? जाहिर है नाटक मंच पर अभिनीत होने के लिए ही लिखा जाता है वरना उपन्यास या कहानी क्यों न लिखें। उपन्यास, कविता, कहानी लेखक को पूर्ण स्वातंत्र्य देते हैं। वो अपने विचारों का बिना किसी बन्धन के उल्लेखन कर सकते हैं पर एक सफल नाटककार मंच की सीमा में आबद्ध है और वही नाटककार सफल हो सकता है जो इस सीमा में रहते भी मार्मिक रूप से अपने विचारों द्वारा पात्रों को वास्तविक जीवन दान दे सके। मानव मनःस्थिति का विश्लेषण तथा उसके अन्तर्द्वन्द्व का चित्रण, उसकी जीवन भूमिका का उल्लेख जिस सरलता से उपन्यास तथा कहानी में हो सकता है, वह नाटक में संभव नहीं। एक नाटककार को सब कुछ केवल कथोपकथन से ही स्पष्ट करना पड़ता है और कथोपकथन इतना स्वाभाविक, मार्मिक तथा हृदय स्पर्शी होना चाहिए कि उसी के द्वारा पात्रों के व्यक्तित्व तथा उनकी अन्तरात्मा, उनके विचार, उनके अन्तर्द्वन्द्व दर्शकों को इतने स्पष्ट रूप से दर्शित हो सकें कि सब पात्र दर्शकों को परिचित से लगें। इसलिए मेरे विचार में साहित्य की अन्य रचनाओं से कठिन सफल नाटक की रचना होती है।
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