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Bharat Mein Shiksha Ka Vikas

Bharat Mein Shiksha Ka Vikas

Virender Singh

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जैसा कि यह सभी जानते हैं कि भारत 15 अगस्त 1947 को अंग्रेजों की गुलामी से आजाद हुआ। सब यही समझते हैं कि हम उसी दिन स्वतंत्र हुए। लेकिन यह एक बहुत बड़ा भ्रम था। महात्मा गांधी ने अंग्रेजों से सामने बिना किसी शर्त के पूर्ण स्वतंत्रता की मांग रखी थी। लेकिन भारत के ही कुछ स्वार्थी लोगों ने अंग्रेजों की राष्ट्र विरोधी शर्तों को सशर्त स्वीकार कर लिया था. जिसमें एक भाषा नीति भी थी। अंग्रेजों को पता था कि यह देश अपनी भाषा के बल पर आगे और भी प्रगति कर सकता है। इसी को रोकने के लिए अंग्रेजों ने कुछ अंग्रेजी प्रिय भारतीयों के साथ मिलकर भारतीय शिक्षा पद्धति में संस्कृत को स्थान न देने जैसे राष्ट्र विरोधी शर्तें भी शामिल की। अब प्रश्न यह उठता हैं कि ऐसी स्थिति उत्पन्न क्यों हुई? समस्या जितनी गंभीर होती है, उसके कारण भी बहुत शोधगम्य होते हैं। इसकी शुरूआत भी आजादी के पहले से होती है। मैकाले नामक अंग्रेज के ही वह जहरीले बीज हैं, जो अब फलीभूत हो रहें हैं। दरअसल, अंग्रेजों ने भारत की सामाजिक और आर्थिक स्थिति का सर्वेक्षण करने के बाद, जो शिक्षा नीति भारत को गुलाम बनाये रखने के लिए बनायी थी, वही नीति स्वतंत्रता के बाद भी कुछ लोगों द्वारा जारी रखी गई, जिसका परिणाम हैं कि आज हमारी शिक्षा व्यवस्था रोजगार की गारंटी नहीं देती। शिक्षित होने के बाद भी नैतिकता की कोई गारंटी नहीं है तथा स्थिति तो और भी बदतर तब हो जाती है, जब पढ़े-लिखे शिक्षा प्राप्त लोगों में इन सभी स्थितियों के बारे में उदासीनता पायी जाती है। उनमें न भारतीय संस्कृति के प्रति आदर है और न ही उन्हें इसकी परवाह है। उच्च शिक्षा प्राप्त आधुनिक पीढ़ी के मन में भारतीय इतिहास के बारे में गौरव की भावना नहीं है, क्योंकि उनके पाठ्यक्रम में हमने वही परोसा ही है, जिसका परिणाम यह हुआ कि वे अपने आप को सर्वश्रेष्ठ भारतीय समझने की बजाय अपने आप को कुठित एवं दब-कुचले महसूस करते हैं। इसका कारण उनका पाठ्यक्रम हैं, जिसमें ज्ञान-विज्ञान का संपूर्ण स्रोत पश्चिमी विद्वान है। उन्हें भारतीय वैज्ञानिकों का नाम भी पता नहीं होता है। उनके लिए भारत तो केवल जमीन का टुकडा मात्र है। ऐसा हो भी क्यों ना? अंग्रेजों की खुराफाती दिमाग जाते-जाते भी हमें भेदभाव और अज्ञान का शिक्षा विरासत में दे गए।

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Author

Virender Singh

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