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Bhartiya Pramukh Regimenton Ke Veer Yoddha

Bhartiya Pramukh Regimenton Ke Veer Yoddha

R. P. Singh

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चीनी आक्रमण का आभास 8 जुलाई, 1962 को तब हुआ जब गलवान पोस्ट पर भारत के जे. सी. ओ. जंग बहादुर गुरंग और उनके कुछ सिपाही चीनी आक्रमणकारियों से भिड़ गए थे। तभी से मेजर धान सिंह थापा ने खंदक बनाने का कार्य अपने साथियों के साथ मिलकर शुरू कर दिया था। खंदक सिपाही का सुरक्षा कवच होता है, इसलिए इसकी युद्ध में आवश्यकता पड़ती है। युद्ध की चुनौती को स्वीकार करते हुए मेजर थापा 8 जुलाई से ही तैयारी में जुट गए थे। खंदक बनाना उस पहाड़ पर बड़ा ही कठिन काम था लेकिन फिर भी सिपाही दिन-रात इसी कार्य में जुटे रहे। 20 अक्टूबर, सन् 1962 की सुबह चुशूल गाँव के बाहर की ओर अन्य दिनों की भाँति न होकर कुछ अलग से हलचल दिखाई दी। इसी के साथ उनकी तरफ से गोली चलने की आवाज आ रही थी। आज भ्रम टूट गया था। चीनी सैनिक पोस्ट के निकट की ओर आ रहे थे। मेजर धान सिंह थापा ने अपने सैनिकों को गोरखा राइफल्स का इतिहास दोहराने की बात कही और कहा, घबराने की बात नहीं है, हम मातृभूमि की रक्षा हेतु यहाँ आए हैं, एक इंच भूमि भी चीन को नहीं देंगे।

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Author

R. P. Singh

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