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Bhartiya Punarjagaran Aur Arya Samaj
Bhartiya Punarjagaran Aur Arya Samaj
Dharampal Sharma
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भारतीय सांस्कृतिक जीवनधारा', वैदिक युग की गंगोत्री से निकलकर उपनिषद-काल की भव्य घाटियों को पार करती, ऋषिकल्पों की धूल माथे चढ़ाती, गुरूकुलों का संस्पर्श प्राप्त करती, रामायण, महाभारत एवं पौराणिक युग के उपवनों को जीवनरस देती, चरित्रों की सौरभ सुगन्ध ग्रहण करती, जैन, बौद्ध, मौर्य, ग्रीक, हूण, कुषाण कालीन विविध मुखी उपवनों पठारी पृष्ठभूमियों, खाई-खन्दकों, बीहड़ों को पार करती हुई गुप्त, शुंग, सातवाहन, चोल, चालुक्य, चन्देलकालीन सुरम्य समतल सांस्कृतिक मैदान में बहती, राजपूतकाल के त्याग, तप, बलिदान, शौर्य, विक्रम, पराक्रम की यशोगाथा गाती, संधि-विग्रह, भोग-विलास, पतन-पराभव देखती, तुर्क, यवन, मुगल, डच, फ्रान्सीसी, पुर्तगाली और अंग्रेज जातियों के तपन भरे मरूस्थल से गुजरते हुए भी विलुप्त नहीं हुई। यह अंग्रेजों के पंच-मकार (मर्चेंट, मिलिट्री, मैकाले, मैक्समूलर और मिशनरी) के कुप्रभाव से मूर्छावस्था को अवश्य प्राप्त हुई, किन्तु इसका श्वासोच्छवास जारी रहा। उत्थान एवं पतन, सृष्टि का शाश्वत् नियम है। 18वीं सदी के इस घोर अवसाद एवं अन्धकारमय युग के बाद, 19वीं सदी में पुनर्जागरण की किरणें प्रस्फुरित हुई। महर्षि दयानन्द एवं अन्य अनेक युगीन महापुरूषों को नियति ने प्रकाश पुञ्ज देकर भारतभूमि पर अवतीर्ण किया। इन्होंने अपने आचरणों, वचनों एवं कार्यों के द्वारा युग की तन्द्रा और तमस को भगाकर नवज्योति एवं जागृति का संचार किया। फलतः आर्यसमाज, ब्रह्मसमाज, प्रार्थनासमाज, देवसमाज, सत्यशोधक समाज, सनातन संगठन, थियोसोफिकल सोसाइटी, रामकृष्ण मिशन, अरविन्द सोसाइटी, राधास्वामी संगठन, युगनिर्माण मिशन, सत्यसाई, ओशो आदि का प्राकट्य हुआ। इनकी पुनर्जागरण सुधा का सत्व ग्रहण कर यह जीवनधारा 19वीं सदी में पुनः स्वस्थता को प्राप्त होकर, अपने प्राचीन गौरव के बिखरे मोतियों को बटोरने लगी। इस पुस्तक में इन्हीं तथ्यों को समेटने का प्रयास किया गया है। अब हम सब की जिम्मेदारी है कि इस पुनर्जागरण को 'परमवैभवम्' तक ले जावें।
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- HIN- Hindi
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978-93-91859-84-8
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No. of pages
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336
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