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Daanveer Karan

Daanveer Karan

Vanshidhar Chaturvedi

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महाभारत के पात्रों में कर्ण की विशेष गणना है। इसका कारण यह है कि सारी प्रतिभाओं व योग्यताओं के होते हुए भी उसे तत्कालीन समाज में उपेक्षित और अपमानित होने की त्रासदी को झेलते रहना पड़ा। कर्ण के जीवन की ही विडम्बना थी कि वह वास्तव में राजपुत्र होते हुए भी सूतपुत्र कहलाता रहा। उसने जीवनभर उस अपराध का दण्ड भोगा जो उसने किया ही नहीं था। इसे कर्ण का दुर्भाग्य कहा जाए या सामयिक परिस्थितियाँ कि उसका पालन उसकी जन्मदात्री-माँ के हाथों नहीं वरन् सूत परिवार में हुआ। कर्ण ने जब होश संभाला तो उसे माँ के रूप में सूतपत्नी राधा और पिता के रूप में सूत अधिरथ ही दिखाई पड़े। उन्हीं की स्नेह छाया में वह पला और बढ़ा। आगे चलकर वह महान धनुर्धर व महान योद्धा भी बना और अंगदेश का राजा भी। इस उपन्यास में कर्ण के व्यापक चरित्र को समेटने का किंचित प्रयास किया गया है। कहीं-कहीं कल्पना अवश्य है परन्तु तथ्यों को टूटने नहीं दिया गया है, यथासंभव रोचकता को बनाने की भी चेष्टा रही है। आशा है सरल, सुबोध शैली में लिखा गया कर्ण का यह चरित्र शिक्षाप्रद तो लगेगा ही, साथ ही मनको छुयेगा-ऐसी आशा और कामना है।

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Hard Cover

Author

Vanshidhar Chaturvedi

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