Jati Hui Dhoop
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अनेक पुस्तकों के रचयिता, प्रसिद्ध पत्रकार, समाजसेवी एवं अविरल भावों में पूर्णतया स्नात, अनूठे शब्द-शिल्पी श्री बी. एल. गौड़ के नवीनतम एवं महत्त्वपूर्ण काव्य-संग्रह 'जाती हुई धूप' की रचनाएँ एक नये आलोक-पर्व की रचना करते हुए आती हैं। ये रचनाएँ विशेषकर गीत और फ्रीवर्स का रूप लेकर अवतरित हुई हैं। मैं यहाँ इन रचनाओं को अवतरित होना कह रहा हूँ वह इसलिए क्योंकि मैं मानता हूँ कि कुछ रचनाएँ लिखी जाती है और कुछ अवतरित होती हैं। लिखी हुई रचनाओं में प्रयास दिखाई देता है और अवतरण में सहज रूप। अवतरित होने में कोई युग-परिवर्तनकारी उद्देश्य भी छुपा होता है। गौड़ साहब की इन रचनाओं में जहाँ एक ओर शांत एकांत का जादू है और सामाजिक परिवर्तन भी। और यही किसी भी जागरूक लेखक का अपनी रचनाओं द्वारा किया गया महत्त्वपूर्ण कार्य होता है, जिसे गौड़ साहब ने पूरी निष्ठा के साथ सम्पन्न किया है। इस संग्रह की रचनाओं को पढ़कर और सुनकर मुझे लगा कि जैसे 'फ्री-वर्स' यानि अतुकांत कविता निर्द्वन्द्व, निर्विघ्न और त्वरित गति से बहने वाले झरने के प्रवाह वाली प्रभावशाली काव्यधारा है और गीत नदी की वह काव्यधारा है जो तटबंधों के बीच कभी मंधर गति और कभी तीव्र गति से प्रवाहित होती रहती है और हमें अपनी तरलता में स्नान करने का आमंत्रण देती है! 'फ्री-वर्स' बंधन-रहित मुक्त प्रवाह है और गीत बंधनों से युक्त मुक्त-प्रवाह । 'फ्री-वर्स' का झरना विचारों के अनगढ़ पत्थरों को रेत का रूप देकर उसे स्वयं में आत्मसात करता चलता है, स्वयं में मिला लेता है और इधर जो गीत की धारा है वह इस विचार की रेत को फर्श की तरह बिछाकर उसके ऊपर विचरण करने वाला वह भाव-प्रवाह है जो विचारों की इस रेत को शीतल करके उसे मस्तक और हृदय पर चंदन की तरह लगाने की प्रेरणा देता है। सचमुच ही ये रचनाएँ झरने का अवतरण भी हैं और नदी का सतत प्रवाह भी, विचारों का संवेदनात्मक विस्फोट भी हैं और भावनाओं का विचार-प्रस्फुटन भी, स्वान्तः सुखाय भी हैं और पर-सुखाय भी। इनमें चिंतन के तार की झंकृतियाँ भी हैं और मन के मृदंग की सहज थाप भी। ऐसी सरल और सम्प्रेषणीय, प्रतीकात्मक तथा भावानुरूप भाषा के अद्भुत समन्वय वाली ये रचनाएँ पाठकों और श्रोताओं को अवश्य ही रस-प्लावित करेंगी तथा उनके चिंतन को और भी प्रखर करेंगी, ऐसा मेरा विश्वास है। अनन्त शुभकामनाओं के साथ।
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