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Jhansi ki Veerangna

Jhansi ki Veerangna

Vanshidhar Chaturvedi

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प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में झाँसी की वीरांगना महारानी लक्ष्मीबाई का अग्रणी स्थान है। यह स्थान उनके अतुलनीय बलिदान, पराक्रम एवं वीरता के कारण है, जिसको उन्होंने अंग्रेजों से डटकर लोहा लेकर सिद्ध किया। सन् 1857 की क्रांति वास्तव में स्वाधीनता के लिए भारतीय लोगों के मर मिटने का इतिहास और स्वतंत्रता का युद्ध था तथा महारानी लक्ष्मीबाई उस युद्ध की प्राण और प्रेरणा थी। शत्रु उनकी वीरता और गुणों की मुक्त कण्ठ से प्रशंसा करते थे। अंग्रेज जनरल सर ह्यूरोज ने रानी की प्रशंसा करते हुए अपनी डायरी में लिखा था-"वह शत्रु दल की सबसे बहादुर और सर्वश्रेष्ठ सेनानायिका थीं।" इसके साथ ही एक लेखक ने उनके विषय में लिखा है कि "वह फ्रांस की 'जोन आफ आर्क' के समान वीर देशभक्त थीं।" रानी लक्ष्मीबाई वीरता, पराक्रम तथा युद्ध कौशल मे ही अतुलनीय नहीं थीं वरन् शासन और प्रशासन का भी कुशल संचालन करने में उन्हें महारत प्राप्त थी। जब झाँसी राज्य का अंग्रेजों द्वारा बंदोबस्त किए जाने का प्रसंग आया तो रानी ने दो टूक शब्दों में अंग्रेज प्रतिनिधि का चुनौती भरे स्वर में उत्तर दिया- "मैं अपनी झाँसी किसी हाल में न दूँगी।" इस कथन को उन्होंने मरते दम तक चरितार्थ करके दिखाया। उनकी वीरतापूर्ण अमर गाथा को अपनी स्मृतियों में सँजोए रखने के लिए ही इस पुस्तक की रचना की गई है, जो पाठकों को समर्पित है।

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Binding

Hard Cover

Author

Vanshidhar Chaturvedi

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