Jiye Kandhar Vol. 1
Jiye Kandhar Vol. 1
Ganesh Prasad Baranval
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भारत के गुप्तकालीन इतिहास के कैनवास पर काल्पनिकता की तूलिका से इस उपन्यास का रूप विन्यास किया गया है। वस्तुतः एक तलाश का ऐतिहासिक पड़ाव है यह उपन्यास।
तलाश है वर्तमान भारत के उत्तर-पश्चिमी सीमा पार के क्रूर आतंकवादियों के पूर्वज शकों एवं हूणों की-लगभग समान उद्देश्य तथा गतिविधियों वाले। कांधार-गांधार (अब अफगानिस्तान) इनका मुख्यालय बन गया था-भारतीय नरेशों की सीमा सुरक्षा-उपेक्षा के कारण।
यह वही कांधार है जहाँ 1999 ई. में आतंकवादियों के चंगुल से विमान सहित भारत के 159 यात्री बहुत दर्दनाक और शर्मनाक स्थिति में रिहा कराए गए थे चौथी-पाँचवीं शती के गुप्त सम्राटों यथा चन्द्रगुप्त, कुमारगुप्त, स्कन्दगुप्त ने कांधार की संवेदनशीलता को समझ उसे आतंकजीवी हूणों से मुक्त ही नहीं कराया अपितु अगले अनेक दशकों तक शकों-हूणों से भारत को निरापद रखा।
इसके लिए इन सम्राटों को भारत रक्षक का विरुद दिया गया। गुप्त शासन एकतंत्रात्मक होते हुए भी प्रबुद्ध है-सर्वजन हिताय, साहित्य- विज्ञान-कला संरक्षणाय समर्पित अत्युक्ति नहीं होगी कि उपन्यास 'जिये कांधार' इतिहास, काल्पनिकता एवं प्रासंगिकता का 'प्रयाग' है - गणेश बरनवाल
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Product Details
Language
Language
- HIN- Hindi
ISBN
ISBN
9789383276011
Binding
Binding
Hard Cover
Age Group
Age Group
- Adults
