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Kautilya ka Arthshastra

Kautilya ka Arthshastra

Bimla Devi

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"राजा नन्द मेरी ही प्रदीप्त आग में एक पंतगे की तरह जलकर भस्म हो चुका है। भूतल पर से सम्पूर्ण नन्द वंश का समूल नाश हो चुका है। अभी भी मैंने अपनी शिखा को बाँधा नहीं है, प्रतिज्ञा के भार से मैं मुक्त अवश्य हो चुका हूँ किन्तु चन्द्रगुप्त का आग्रह है जिसने मुझे आज तक शस्त्र धारण करने को विवश कर दिया हैं। मैंने पश्चिमोत्तर भारत के छोटे-छोटे गणतंत्रों और राज्यतंत्रों को मिलाकर एक कर दिया है। अब वे मिलकर यवनों को देश से बाहर निकाल सकते हैं। "सम्राट सेल्यूकस आचार्य के चरणों में झुक जाता हे मुझे तो आपका आशीर्वाद चाहिए। मैं तो सन्धि पत्र.. । तुम दोनों सम्राट हो सेल्यूकस। तुम दोनों के बीच सन्धि का अजस्त्र स्रोत है, उसे प्रवाहित करो सेल्यूकस। मैं आपकी पुत्री हेलेन को भारत की साम्राज्ञी बनाने के लिए उसका हाथ चन्द्रगुप्त के लिए माँगता हूं।" एक बार यूनानी राजदूत ने चन्द्रगुप्त से आग्रह किया कि मैं आचार्य चाणक्य से मिलना चाहता हूँ। चन्द्रगुप्त रात्रि के अँधेरे में राजदूत को लेकर चाणक्य की झोपड़ी में पहुँचता है और क्या देखता है कि चाणक्य एक मोमबत्ती की रोशनी में कुछ लिख रहा है। जैसे ही राजदूत का परिचय चन्द्रगुप्त ने चाणक्य से कराया तो आचार्य ने उस मोमबत्ती को बुझाकर एक नई मोमबत्ती को जलाया। राजदूत ने जब आचार्य से यह पूछा कि दूसरी मोमबत्ती जलाने का कारण क्या है। तो उन्होंने उत्तर दिया कि जो मोमबत्ती पहले जल रही थी वह राजकोश से आई थी। जिसकी रोशनी में मैं राज्य के लिए कुछ निर्देश लिख रहा था। अब चूँकि मैं आपसे अपनी व्यक्तिगत बात कर रहा हूँ। अतः यह मेरी व्यक्तिगत मोमबत्ती है। राजदूत ने कहा कि जिस राष्ट्र का आचार्य इतनी छोटी बात को ध्यान में रखता है। वह राष्ट्र अवश्य ही सोने की चिड़िया है। इसमें कोई शक नहीं।

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Author

Bimla Devi

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