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Khoi Hui Dishayen

Khoi Hui Dishayen

S.R.Yatri

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स्वातंत्र्योत्तर भारत में नई पीढ़ी अपनी समस्त रचनात्मकता के बावजूद दिग्भ्रमित होकर दिशाहीन होती चली गई है। यदि व्यक्ति के पीछे धनबल-बाहुबल और पक्षधरता के कारक नहीं हैं तो उसकी प्रतिभा के कार्यक्षम होने के मार्ग में बहुविध अवरोध ही अवरोध हैं। से. रा. यात्री के उपन्यास में भारत के नागरिक एवं ग्रामीण जीवन का सम्यक स्वरूप आकलित हुआ है और नायक को किसी भी सकारात्मक मार्ग का अवलम्बन प्राप्त नहीं हो सका है। यह आज के युवक का आन्तरिक और त्रासद सच है। भाषा को लेकर यात्री का एक ही विचार है कि पाठक को कला के नाम पर अमूर्तता की भुल-भुलैयों में न भटकाया जाय।

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Hard Cover

Author

S.R.Yatri

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