Lokpriya Kavi Rahim
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रहीम शहंशाह अकबर के दरबार के नौ रत्नों में से एक थे। वह एक कवि होने के साथ-साथ सबसे बड़े लड़इया भी थे। उनके नेतृत्व में मुगलों ने कई युद्ध भी जीते थे। अकबर ने उनके पराक्रम से प्रभावित होकर उन्हें खान-खाना की उपाधि से नवाजा था। तभी से उनका पूरा नाम अबदुर्ररहीम ‘खानखाना’ पड़ गया लेकिन उन्होंने काव्यों की रचनाएं ‘रहीम’ के नाम से ही की। रहीम के काव्य का आधार ब्रजभाषा है लेकिन वह तुर्की, फारसी, संस्कृत आदि भाषाओं के भी प्रकांड विद्वान थे। उन्होंने जिस चीज को जिस रूप में देखा, उसी रूप में लिखा। यही कारण है कि रहीम की रचनाएँ जनमानस में इतनी लोकप्रिय हैं। रहीम एक कुशल सेनानी भी थे। जिससे उनकी रचनाओं में योद्धा की विशेषताओं के बारे में भी खुलकर लिखा गया है। प्रस्तुत पुस्तक में रहीम के पूरे व्यक्तित्व-कृतित्व का वर्णन मिलेगा।
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