Mahan Yoddha : Maharaja Surajmal
Mahan Yoddha : Maharaja Surajmal
R. P. Singh
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जहाँ तक आपने नरहत्या तथा विनाश का भयप्रद तथा तीव्र आदेश भेजा है, वीरों को इस दुख से भय नहीं होता। यह सभी समझते हैं कि कोई भी बुद्धिवादी नश्वर जीवन में आस्था नहीं रखता। जहाँ तक मेरा सवाल है, मैं अपनी आयु के पचास वर्ष पार कर चुका हूँ और शेष के बारे में कुछ नहीं समझता। मेरे लिए इससे अधिक सौभाग्य की बात क्या होगी कि मैं वीरगति का अमृतपान करूँ। जो मुझे वीरों के अखाड़े में और रणक्षेत्र में वीर सैनिकों के साथ पीना है, ताकि मेरा तथा मेरे पूर्वजों का नाम युग के पृष्ठों पर याद किया जा सके कि एक अशक्त किसान ने महान तथा शक्तिशाली शहंशाह के साथ, जिसने बड़े-बड़े संपन्न सम्राटों को समर्पण के लिए बाध्य कर दिया था, समानता मान कर युद्ध किया और वीरगति प्राप्त की। मेरे स्वामिभक्त योद्धा तथा साथियों के हृदय में भी यह पुनीत विचार है। यदि मैं आपके स्वर्ग से भी अति रमणीक दरबार की दहलीज पर उपस्थित होने का विचार करूँ तो मेरे साथियों का सम्मान मुझे इस प्रकार उपस्थित होने के लिए आज्ञा नहीं देगा।
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Product Details
Language
Language
- HIN- Hindi
ISBN
ISBN
9789392602719
Binding
Binding
Hard Cover
Age Group
Age Group
- Adults
No. of pages
No. of pages
176
Book Dimension
Book Dimension
22.5 cm x 15 cm x 1.6 cm
Item Weight
Item Weight
476 grams
