Mano, Na Mano
Mano, Na Mano
Dr. Endu Bali
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इन्दुबाली के इस बारहवें संग्रह की कहानियों न तो किसी कथा-आंदोलन के तहत और न ही कहानीपन के चालू चौखटों में अॅट पाएँगी। शायद इनमें चौंकानेवाले संवाद और जटिल घटनाएँ भी नहीं मिलेंगी। पात्र-मंडल ज्यादातर संपन्न, मध्यवर्ग का है। परिवेश परिवार भी है, तथा एन.आर.आई. डाएस्पोरा भी। अधिकांश कहानियाँ नारी-केंद्रित हैं। ये रूमानी मानसिकता वाली हैं भी, और नहीं भी मानो, न मानो। नायिकाएँ विद्रोहिणी होकर कठिन फैसले करती हैं लेकिन सही मर्यादा की संस्थापना के लिए वे प्रेम करती हैं किंतु समानता तथा आत्मसम्मान के साथ। वे नेत्री भी हैं किन्तु यथार्थवाद को अपने दृढ़ व्यक्तित्वों से आदर्शोन्मुख बना देती हैं। कहानी दृष्टि में आभिजात्य है तथा कहीं भी अभद्रता और अश्लीलता दृष्टिगोचर नहीं होती। यह तथ्य रेखांकित किया जा सकता है। कसी-मँजी भाषा के चक्रचिह्न भी प्रोक्ति, अभिभाषण, व्याख्या, आत्ममंथन की संचेतना से भरपूर हैं। यही इंदु-कलाएँ हैं। जैसा कि ध्यातव्य है, इन कहानियों में आभिजात्य-परक शील तथा शालीनता के स्तर बरकरार हैं। दो और तीन पीढ़ियों को समेटने वाली कई कहानियों में दूसरी पीढ़ी के वाल्दैन भी स्वाभिमानी फैसले करते हैं, तो पहली पीढ़ी के दादा-दादी, नाना-नानी भी युवा तीसरी पीढ़ी के साथ साझेदारी करके 'नये परिवार' का दिवास्वप्न देखते-दिखाते हैं। इस तरह लेखिका परिवार को बचाने तथा नारी को समान अधिकार दिलाने के अभियान का सही-सुंदर स्वप्न साकार कर देती है। ये कहानियाँ रसास्वाद तथा ज्ञानप्रकाश की धूप-छाँह वाली हैं। तो आइए, आधुनिकता के मुख्यद्वार में दाखिल हो रहे समाज तथा परिवार की तीनों पीढ़ियों की एकता और संघर्ष का सामना करें। साथ ही बेटियों-पत्नियों-बहुओं को, पतियों-बेटों- गृहवरिष्ठों का नये ढंग से परिचय प्राप्त करें!
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Dr. Endu Bali
