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Mirza Ghalib Ki Chuninda Shayari

Mirza Ghalib Ki Chuninda Shayari

Devendra Manjhi

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वह कल भी सफे-अव्वल पर था, आज भी है और आनेवाले समय में भी काव्याकाश पर अपनी शायरी के सुनहरे पंख फैलाए दोपहर के सूरज की तरह चमचमाता-इठलाता हुआ मिलेगा। सचमुच, उसका कोई सानी (उस जैसा कोई अन्य) नहीं। मैं बात कर रहा हूँ आज से लगभग दो सौ सोलह साल पहले 28 दिसंबर, 1797 को ताज नगरी आगरा में जन्म लेनेवाले शख्स 'असद उल्लाह' की, जिसे सारा जमाना 'मिर्जा गालिब' के नाम से जानता है। दस ग्यारह वर्ष की अल्पायु में मक्तब (पाठशाला) में पढ़ाई के दौरान ही ग़ालिब ने शे'र कहने शुरू कर दिए थे। शुरू में 'असद' उपनाम से शे'र कहते थे मगर बाद में यह उपनाम बदलकर 'गालिब' कर दिया गया। इस पर एक बार गालिब के एक प्रशंसक ने पूछा कि हुजूर, 'असद' से 'ग़ालिब क्यों हो गए तो मिर्ज़ा ग़ालिब ने मुस्कुराकर जवाब देते हुए कहा कि मेरा वास्तविक नाम 'असद उल्लाह' है, जिसका अर्थ है-'अल्लाह का शेर'। 'असद' का अर्थ है-शेर। शेर शक्तिशाली होता है, जबरदस्त होता है और जंगल का राजा इसीलिए कहलाता है कि वह विजेता भी होता है, इसी तरह 'गालिब' का अर्थ भी शक्तिशाली, ज़बरदस्त और विजेता होता है। मैं तो तब भी अपने क्षेत्र (शायरी) में शक्तिशाली था, आज भी शक्तिशाली हूँ। जीवन के अंतिम दिनों में इस महान् शायर को आर्थिक और शारीरिक दोनों ही संकटों से जूझना पड़ा। 1858 ईस्वी में उन्हें बीमारियों ने इस कदर घेरा कि मरते दम तक वे आज़ाद न हो पाए और आख़िर ऊबकर 15 फरवरी, 1859 की दोपहर को इस दुनिया को अलविदा कह गए।

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Author

Devendra Manjhi

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