Murkh Bankar Jiyo
Murkh Bankar Jiyo
Ghamandilal Agarwal
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हिन्दी साहित्य की अन्य विधाओं की भांति 'व्यंग्य' भी एक सशक्त विधा बनकर उभरी है। यों तो व्यंग्य का पुट अन्य विधाओं में भी कहीं-न-कहीं दिखाई पड़ जाता है, फिर भी अलग रूप में न होने से इसकी अभिव्यक्ति खुलकर नहीं हो पाती है।
इसी पीड़ा को देश के तमाम व्यंग्यकारों ने शिद्दत से महसूस किया और व्यंग्य को स्वतंत्र विधा के रूप में स्थापित करने में अपना अमूल्य योगदान दिया। समाज को प्रभावित करने, आह्लादित करने, जीवन में बढ़ती हुई विद्रूपताओं को मुखर करने एवं बात को फटाक से कह देने की जो क्षमता व्यंग्य में निहित है, अन्य किसी विधा में भला कहां? यह अपने पाठकों से सीधा संवाद करता है।
इसे पढ़कर व समझकर लोग तिलमिलाते हैं और मुस्कराते हैं। व्यंग्य का जादू सिर चढ़कर बोलता है, समाज की परत-दर-परत खोलता है। 'मूर्ख बनकर जियो' प्रख्यात साहित्यकार डॉ. घमंडीलाल अग्रवाल की प्रथम व्यंग्य कृति है।
कृति के सभी व्यंग्य लेखों के जरिए समाज की उस तसवीर को पाठकों के समझ लाया गया है जो सदा दर्पण के पीछे ही रहा करती है। राजनीतिक विसंगतियों की ओर भी इन लेखों में इशारा किया गया है।
आशा है कि खुलेमन से कृति का स्वागत किया जाएगा।
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Product Details
Language
Language
- HIN- Hindi
ISBN
ISBN
9789392707254
Binding
Binding
Hard Cover
Age Group
Age Group
- All Age Groups
