Nari Hinsa Ek Abhishap
Nari Hinsa Ek Abhishap
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समाज के निर्माण एवं अस्तित्व को बनाए रखने के दृष्टिकोण से प्रकृति ने स्त्री एवं पुरुष दो सामाजिक इकाइयों की रचना की है। प्रकृति की मूल मान्यता के विपरीत पुरुष प्रधान मानव समाज ने स्त्री की जैविक एवं प्राकृतिक विभिन्नताओं को उसकी शारीरिक एवं मानसिक निर्बलता माना है। नारी समाज की जीवंत इकाई है तथा उनकी उपेक्षा आधी दुनिया की उपेक्षा है, उसे दुर्बल या अबला मानना नारी का अपमान है। भारत में सरकार और समाज दोनों ने नारियों के अधिकार और कर्तव्यों की रक्षा के लिए अनेक कानून बनाए हैं और नित्यप्रति उनकी सुरक्षा की दुहाई दी जा रही है, किन्तु स्थिति दिन-प्रतिदिन विपरीत ही होती जा रही है। बहुत से नियम सिद्धान्त ही बनकर रह गए हैं और उन पर किए जाने वाले अत्याचारों की निरंतर वृद्धि होती जा रही है। यौनाचार तथा बलात्कार की इतनी अमानवीय घटनाएँ घट रही हैं। एक तरफ तो दुनिया भर में तरक्की के ढोल पीटे जा रहे हैं, दूसरी तरफ विकसित से लेकर पिछड़े देशों तक में औरतों के साथ जानवरों जैसा सलूक किए जाने की प्रवृत्ति यथावत है। समाज को तटस्थ होकर विश्लेषण करना पड़ेगा। यदि समाज बचाना है तो ऐसे अपराधों को रोकना होगा। नई चेतना उत्पन्न करने का प्रयास करना होगा। प्रस्तुत पुस्तक में प्रताड़ित महिलाओं के अनुभवों एवं सुझावों को उनके मूल स्वरूप में रखने का प्रयास किया है। नारी के शोषण से सम्बंधित सभी आयामों को समाविष्ट करने का प्रयास किया है, ताकि समाज की आँखें खुलें और भयंकर स्थिति पैदा होने से पहले ही कोई उपाय करें।
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