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Naxal Hinsa: Ek Jansangharsh Ka Bhatkaav

Naxal Hinsa: Ek Jansangharsh Ka Bhatkaav

Dr. Virendra Singh Baghel

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हाल तक नक्सलवाद को जनसंघर्ष के हिंसक ही सही पर वैचारिक तकाजे के रूप में ही स्वीकार किया जाता था। यह तकाजा आज भी समाप्त नहीं हुआ है, अलबत्ता विवादित जरूर हो गया है। ओडिशा, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखण्ड और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में अपनी सघन पकड़ से आगे नक्सली नेटवर्क कई अन्य सूबों में भी खतरनाक मंसूबों को अंजाम देने में लगे हैं। नक्सलियों से निपटने के लिए पलटने उतारने का तजुर्बा जितना सफल नहीं रहा, उससे ज्यादा उसकी प्रतिक्रिया- वादी कीमत चुकानी पड़ी।

केन्द्र सरकार का गृह मंत्रालय पिछले कई सालों में यह तो जरूर मान रहा है कि स्थानीय स्तर पर शासन और विकास के अभाव को दूर करके ही माओवादी चुनौती से निपटा जा सकता है। इसके क्रियान्वयन के देशव्यापी प्रयास या तो हुए नहीं हैं या फिर जहाँ हुए हैं, उनको माओवादियों के अड़ंगे के चलते धक्का लगा है। उधर जल, जमीन और जंगल के मालिकान को लेकर आदिवासियों के संघर्ष को एक तार्किक अंजाम तक पहुँचाने की उम्मीद अलक्षित हिंसा आग्रहों का भेंट चढ़ता जा रहा है।

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Author

Dr. Virendra Singh Baghel

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