Roop Ka Maykada
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'सुमन' जी के कई गज़ल संग्रह, दोहा संग्रह, गीत-नवगीत संग्रह मैं पढ़ चुकी हूँ। इन ताजा 'कतयात या मुक्तक संग्रह' में भी हिन्दी के साथ फारसी उर्दू के शब्दों का उन्होंने भरपूर प्रयोग किया है पर दूसरों और 'सुमन' जी में फर्क यह है कि इन्होंने फारसी ग़ज़ल कतयात के मिजाज को कायम रखा है। इस प्रकार उन्होंने दो भाषाओं दो तहजीबों को मिलाने की कोशिश की है इसमें शराबे-हुस्न, सौंदर्य की मदिरा इतनी भरपूर है कि वह छलकती जाती है। उन्होंने इन कतयात में कल्पना की जिन ऊचाईयों को छुआ है वह अछूती हैं। 'सुमन' जी उपमा के बादशाह हैं। उन्होंने भारत में मनाये जाने वाले विभिन्न त्योहारों से संबधित सुन्दर कतयात जिस बाखूबी से पेश किये हैं उनसे उनकी सांस्कृतिक चेतना का परिचय मिलता है। 'सुमन' जी उर्दू फारसी और अरबी शब्दों का प्रयोग अपनी ग़ज़लों में, जुमलों में बाखूबी इस तरह करते हैं कि वे अपनी जगह बारीकी और खूबसूरती से बना लेते हैं। इनकी रचनाओं में विभिन्न विषय हैं। जिनमें मुहब्बत की दास्तान और जीवन का जुझारूपन को देखकर प्रेरणादायी बिंदुओं को प्राप्त किया जा सकता है। एक बात और हर उन्वान पर गुज़ल कहना सरल कार्य नहीं है पर फिर भी 'सुमन' अपने लेखन में सफलता प्राप्त कर लेते हैं। ये भावना के महासागर हैं। इसलिए तो इनके गीत, नवगीत और कवितायें उनके कदम से कदम मिला कर चलती हैं, 'सुमन' के बहुत रंग, नूर, रूप हैं, क्या जीवन के रचनाकार हैं! ये तो कबीर के बिरादरी के निकले।
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