Sagar Ke Is Par Se, Us Par Se
Sagar Ke Is Par Se, Us Par Se
Krishan Bihari
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संघर्ष कमोबेश हर किसी की जिन्दगी में होता है परन्तु कुछ लोग ऐसे होते हैं जिन्हें कदम-कदम पर संघर्ष करना पड़ता है। कृष्ण बिहारी ऐसे ही कर्मठ लोगों में से एक हैं। इस किताब में वे अपनी रामकहानी पढ़ाई के तुरन्त बाद अपनी बेरोजगारी और रोजगार के बीच झूलते हुए दिनों से करते हैं। हिन्दी में प्रथम श्रेणी एम.ए. पास नौजवान के साथ दुनिया किस अजीबोगरीब ढंग से पेश आती है और रोजी-रोटी की तलाश उसे कैसे-कैसे नज्जारे दिखाती है इसकी खासी तफसील इस आत्मकथा में है। हालाँकि यह न तो किसी खास बिन्दु से शुरू होती है न ही किसी खास पड़ाव पर जाकर रुकती है, बस एक भरी-पूरी नदी की तरह यहाँ से वहाँ अपनी दिशा तलाशकर बहती नजर आती है।
कृष्ण बिहारी मूलतः कथाकार हैं और उनकी ज्यादातर कहानियाँ आस-पास के लोगों की कहानियाँ हैं। उनकी कहानियों के सैंकड़ों देशी-विदेशी चरित्रों में से कुछ को उन्होंने अपनी आत्मकथा के इस हिस्से में पेश किया है जिनके बिना उनकी खुद की कहानी नहीं कही जा सकती। इनमें से अधिकतर साहित्य और शिक्षा जगत के लोग हैं। कानपुर, सिक्किम, बम्बई और अबूधाबी में गुजारे अपने दिनों और अनुभवों को बहुत बेलौस होकर लिखा गया है। इस पूरी कहानी में से बम्बई के राजेश्वर गंगवार, उनका परिवार और अबूधाबी में शील साहब ऐसे अविस्मरणीय चरित्र हैं जो पाठक को अभिभूत करते हैं। सिक्किम में अध्यापन, कानपुर के दैनिक 'आज' में फीचर लेखन, बेरोजगारी के दिनों में परिवार से सम्बन्ध इन प्रसंगों पर विस्तार से बचकर एक खाड़ी देश में नौकरी मिलने, बम्बई होकर वहाँ पहुँचने और वहाँ के परिवेश को आत्मसात करते हुए सफलतापूर्वक उसे चित्रित करने का एक दिलचस्प ओर बेहद पठनीय विवरण इसमें है जो कहीं-कहीं बड़ी निस्संगता से सच्चाई को पर्त-दर-पर्त खोलता चलता है। अपने कम मीठे और ज्यादातर खट्टे अनुभवों को बड़ी संजीदगी में सुनाते हुए लेखक आत्मकरुणा और हीनभाव से मुक्त रहा है। यह कम बड़ी बात नहीं है। हिन्दी में अब तो अनेक चर्चित आत्मकथाएँ हैं परन्तु बयान की दोटूक शैली के चलते यह पाठकों को उसी तरह आकर्षित करेगी जैसे कृष्ण बिहारी की कहानियाँ करती हैं।
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Product Details
Language
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ISBN
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9789392732454
Binding
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Hard Cover
Age Group
Age Group
- Adults
