Shivpriya
Shivpriya
Shubhangi Bhadbhade
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शिवशंकर ! मृत्युदेवता ! ये सिद्धिदाता तथा मोक्षदाता भी हैं। ओम्कार से जिनका अस्तित्व है, नाब्रह्म से जिनकी उत्पत्ति हुई है-ऐसे शिवमंगल देवता हैं शिवशंकर। उमा दक्षकन्या थी। मनोनुकूल पति प्राप्त करने के लिए उमा ने तपस्या की और तपस्या से पति प्राप्त हुआ और शिवशंकर की प्रथम पत्नी बनी। निर्धन शिवशंकर से विवाह करने के कारण पिता द्वारा यज्ञ में न बुलाने पर भी माया-ममतावश पिता के यज्ञ में चले जाने पर उसे अन्त मे विवश होकर अग्नि-ज्वालाओं का आश्रय लेकर सती हो जाना पड़ा। निर्धन-धनवान्, श्रेष्ठ-कनिष्ठ प्रेम विवाह के कारण उत्पन्न संघर्ष और रोष से उमा को जो मानसिक संघर्ष करना पड़ा उसकी परिणति अन्त में आत्माहुति देने में हुई। स्त्री के रूप में वह पति का अपमान सहन नहीं कर सकती है। उस पतिव्रत्य के लिए ही यह आत्माहुति है।
उमा के सती होने पर संजीवनी देकर उसको सजीव करना शिवशंकर के लिए अशक्य नहीं था। परन्तु कर्मानुसार मिलने वाली गति नियति होती है, यह मानकर वह अपनी कर्मगति को और उसके पश्चात् अदृष्ट शक्ति नियति को मानता है। उमा के बाद वह विवाह कर सकता था-एक नहीं, अनेका परन्तु वह विधुर के रूप में जीवन बिताता रहा। श्रेष्ठ-कनिष्ठ इस भेद में पत्नी का अन्त होने पर वह विनाशकारी प्रलयंकर रूप धारण कर संसार का अन्त करने चल दिया। परन्तु यह क्रोध क्षणिक था। गिरिजा पर्वतश्रेष्ठ हिमराज की कन्या। शिव को प्राप्त करने के लिए तप करती है। परन्तु शिव विवाह के लिए तैयार नहीं हैं। उसके मन में एक ही बात है, "अब मेरा मन प्रौढ़ हो गया है, मैं विधुर हूँ " सुकुमारी गिरिजा की भावनाओं का मैं सम्मान कर पाऊँगा क्या? परन्तु गिरिजा के आग्रह के कारण वह तैयार हो जाता है। शिवशंकर अनन्य दाता हैं। तीनों लोकों में ऐसा दाता कोई नहीं है। वह अत्यन्त परिश्रमपूर्वक एक-एक अनुभूति प्राप्त करता है और उस अनुभूति से प्राप्त हुआ ज्ञान एवं सिद्धि। उन सिद्धियों का आदर कर वर्तमान काल के जन-मानस पर उनका महत्त्व प्रस्थापित करते समय शाश्वत मूल्यों की प्रतिष्ठापना है 'शिवप्रिया'! और यह महापुरुष इस उपन्यास का नायक है।
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Product Details
Language
Language
- HIN- Hindi
ISBN
ISBN
9788119052431
Binding
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Hard Cover
Age Group
Age Group
- Adults
