Shubhada
Shubhada
Shartchandra
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एक तो यह गाँव गंगाजी के किनारे पर बसा हुआ है, दूसरे वहाँ शिवजी के दो- चार बहुत पुराने मंदिर हैं। वे टूटे-फूटे और बस्ती से बाहर हैं। बेंत के जंगल तथा कुश की झाड़ियों में प्रायः अपना आधा हिस्सा छिपाये हुए देखने में ऐसे लगते हैं, जैसे मौन-व्रतधारी योगी हैं। वहाँ दो-एक पक्के तालाब भी हैं, जहाँ गाय-बैल घास चर रहे हैं। दोपहर में हवा की गति बहुत तेज़ हो उठी थी। उसके झकोरों से टक्कर लेने में असमर्थ होने के कारण बादल तितर- बितर हो उठे थे। शाम होते-होते सब महासमारोह के साथ बाजा बजाते हुए इकट्ठा होने लगे। लोगों को लगा, रात में वर्षा ज़रूर होगी। गर्मी कम होगी, मन शांत हो जाएगा, पर शुभदा के लिए यह बहुत ही प्रतिकूल था। एक तो हलूदपुर की झाड़ियों के बीच से होकर जाना था, दूसरे बादल उमड़-घुमड़ रहे थे। तो भी उसे जाना ही पड़ा। दोनों कड़ों को उसने साड़ी के छोर में बाँध लिया। फिर एक चादर से देह को अच्छी तरह ढक कर वह निकल पड़ी।
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Product Details
Language
Language
- HIN- Hindi
ISBN
ISBN
9789392731464
Binding
Binding
Hard Cover
Age Group
Age Group
- Adults
