Vigyan aur Navpravrtan
Vigyan aur Navpravrtan
Virender Singh
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वर्तमान युग में मनुष्य एक कवि की कल्पना की भांति नवोत्पाद तैयार करने तथा नवीनीकरण के लिए तत्पर रहता है। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र जैसे शिशु पालन-पोषण, शिक्षण, प्रशिक्षण, खोज, अनुसंधान कला, विज्ञान, संस्कृति विस्तार आदि में नवप्रवर्तन का बोल बाला देखा जा सकता है। रोजाना कुछ न कुछ नया देखने को मिलता है। कुछ नया करने की ललक यूं तो सदियों से चली आ रही है, लेकिन आज की युवा पीढ़ी में यह ललक कुछ ज्यादा ही देखने को मिल रही है, जिंदगी भी नए अंदाज में जीना चाहते हैं। यह समय की आवश्यकता भी है। वस्तु व सेवा उत्पादन, निर्यात संवर्धन और आयात प्रतिस्थापन भी इससे अछूते नहीं रहे हैं। यहां तक कि आर्थिक विकास एवं संवृद्धि की आधारशिला को सतत नवप्रवर्तन द्वारा ही पोषित तथा पल्लवित किया जा सकता है। मानव सदा से ही अपने जीवन को सुखी और समृद्ध बनाने के लिए प्रयत्नशील रहा है। विज्ञान की प्रगति से फलीभूत नवीन अविष्कार, नवप्रवर्तन को और बलवती करने में सक्षम हुए हैं। मानव सभ्यता का इतिहास मनुष्यों द्वारा उतरोतर बढ़ती हुई आवश्यकताओं की पूर्ति की ओर उठाए विभिन्न चरणों का इतिहास है। पाषण युग से उन्नति के पथ पर चलते हुए मनुष्य आज परमाणु युग में प्रवेश कर चुका है। अब वह समय और दूरी-दोनों पर ही अपना पूर्ण आधिपत्य तथा प्रभुत्व स्थापित कर चुका है।
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Virender Singh
