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Yug Purush Ram

Yug Purush Ram

Akshay Kumar Jain

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राम अमुक देश और युग से जड़ित नहीं रह गए हैं, वह घट-घट में रमे हुए मर्यादा पुरुषोत्तम के प्रतीक हो गए हैं। हर युग को अवकाश है कि वह अपनी आकांक्षा-अभिलाषाओं को उनमें सम्पूर्ण बना देखे।

वह राम इस तरह जातीय आदर्श हो गए हैं, जिनमें हर पीढ़ी अपनी ओर से कुछ-न-कुछ जोड़ती चली गई है। हमारा यह भारत देश इसी मानवोत्तर और लोकोत्तर रूप में राम को देखता और भजता आया है। यह रूप विविध है और उसमें नए-नए आविष्कारों के लिए अनन्त अवकाश हैं।

लेखक ने युगपुरुष राम को परम्परागत रूप में तो लिया ही है, साथ ही अपनी व्यक्तिगत कल्पना और स्पृहा से भी उसे मंडित किया है। यह अनुकूल ही है और अध्यारोप का कोई दोष इसमें नहीं देखा जा सकता। कारण, लेखक और पाठक की आस्था अभंग रहती है। विशेषकर दो स्थलों पर अक्षयकुमार जी ने नई उद्भावना से काम लिया है। कैकेयी के राम-वनवास का वर माँगने में भरत-प्रेम से अधिक राम-प्रेम ही कारण दिखाया गया है।

सूत्र यह नई है और मार्मिक है। इसी भाँति रावण में राक्षस की जगह मनीषी मर्यादाशील विद्वान को देखा गया है। कैकेयी और रावण का इन दोनों भूमिकाओं में समीचीन निर्वाह हुआ है और लेखक के लिए यह बधाई की बात है रामचरित्र के प्रेमियों के लिए यह पुस्तक मूल्यवान है।

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Regular price INR. 440
Regular price INR. 550 Sale price INR. 440
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Product Details

Language

  • HIN- Hindi

ISBN

978-81-19086-56-6

Binding

Hard Cover

Age Group

  • All Age Groups
  • Adults
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