Zauq Ki Chuninda Shayari
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शैख इब्राहिम 'ज़ौक' अपने पिता के इकलौते बेटे थे। बचपन में मुहल्ले के एक अध्याापक हाफिज़ गुलाम रसूल के पास पढ़ने के लिए जाते थे। हाफिज़ जी चूँकि स्वयं शायर थे और मदरसे में शे'रो-शायरी का चर्चा होता रहता था, परिणामस्वरूप बालक इब्राहिम का ध्यान भी इस ओर आकर्षित हुआ। सच कहें तो यहीं से उनके मन-मस्तिष्क में शायरी का अंकुर प्रस्फुटित होने लगा। इसके चलते बालक इब्राहिम ने शे'र कहने शुरू कर दिए। शुरू में छुट-पुट प्रयास किया। फिर दोस्तों की बात मानकर उस समय के एक मशहूर शायर शाह नसीर को अपना उस्ताद बना लिया और अपनी शायरी पर उन्हीं से इस्लाह लेने लगे। लेकिन, यह सिलसिला अधिक न चल सका। उस्ताद की बेरुखी और कपट-व्यवहार से तंग आकर उन्होंने सम्बन्ध विच्छेद कर लिया और फिर आज़ाद रहकर शायरी करने लगे। असद-उल्ला खाँ 'ग़ालिब' अर्थात् मिर्ज़ा ग़ालिब के समकालीन रहे। इब्राहिम 'ज़ौक' को कुछ लोग ग़ालिब का प्रतिद्वंद्वी भी मानते हैं। इब्राहिम 'ज़ौक' की काव्य-प्रतिभा का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब वे मात्र 19 वर्ष की किशोरावस्था में थे तो उन्होंने बादशाह अकबर शाह के दरबार में एक कुसीदा सुनाया इसमें फार्सी काव्य में वर्णित समस्त अलंकार तो थे ही, साथ ही विभिन्न विद्याओं की अच्छी जानकारी दर्शाई गई थी। इसके अतिरिक्त इसमें एक ही ज़मीन में 18 विभिन्न भाषाओं में शे'र कहकर शामिल किए गए थे। इस पर उन्हें 'खाकानी-ए-हिन्द' के खिताब से नवाज़ा गया। ज़ौक़ साहब जब तक रहे खूब लिखा और अन्त में 1854 ईस्वी में सत्रह दिन बीमार रहकर इस फानी दुनिया को अलविदा कह गए।
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